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Monday, May 18, 2026

चाय और नदी का किनारा...


जब कभी गुस्सा बढ़ता है,
और मेरा यह सिर जलता है,
मैं खुद को थोड़ा वक्त देकर,
अपना मन शांत फिर करती हूँ।

नदी का किनारा, चहकती चिड़ियाँ,
देते हैं सुकून की घड़ियाँ,
जिम्मेदारियाँ तो बस फर्ज यहाँ,
इनका कोई जेंडर नहीं होता है।

हाथ में लेकर चाय की चुस्की,
चेहरे पर लाती हूँ हल्की सी मुस्की,
भूलकर दुनिया के सारे झंझट,
मैं खुद में खुश हो जाती हूँ।

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